आँसुओं में डूबा नगराम, दुआओं से रौशन हुई क़ब्रेंसालाना मजलिस-ए-अज़ा में क़ुरआन की सदा, कर्बला का दर्द और बुज़ुर्गों की याद ने हर दिल को रुला दिया, मजलिस में वफ़ा अब्बास की ख़िदमात पर दुआओं की चादर का दिया गया सम्मान

नगराम(लखनऊ) : नगराम की सरज़मीं उस वक़्त ख़ामोशी से भी ज़्यादा बोल रही थी, जब सालाना मजलिस-ए-अज़ा में क़ुरआन की आयतें, कर्बला के मसायब और बुज़ुर्गों की याद एक साथ दिलों पर उतर आईं। यह मजलिस सिर्फ़ एक मजहबी आयोजन नहीं थी, बल्कि उन रूहों से रूहानी रिश्ता जोड़ने का वसीला बनी, जो आज हमारे बीच नहीं हैं, मगर हमारी दुआओं और आँसुओं में ज़िंदा हैं।

मजलिस का आग़ाज़ हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद मुशाहिद आलम रिज़वी साहब ने
इक़रा बिस्मि रब्बिकल लज़ी ख़लक़
की तिलावत से किया। जैसे ही ये आयतें इमामबाड़े की फ़ज़ा में गूंजीं, ऐसा महसूस हुआ मानो इल्म की रौशनी अंधेरों से जंग करने उतर आई हो। मौलाना साहब ने अपने ख़िताब में कहा कि सारी बुराइयों की जड़ जेहालत है, और इसीलिए इस्लाम ने सबसे पहले पढ़ने और समझने का हुक्म दिया। उन्होंने नौजवानों को इल्म से जुड़ने, सोच को मज़बूत करने और किरदार को रौशन करने की नसीहत की।

मजलिस में अज़ादारी का सिलसिला और गहराता चला गया।
मोहम्मद गुलाब की पेशख़्वानी ने माहौल को और ग़मगीन कर दिया।
शाज़र नगरामी और शावेज़ नगरामी के पढ़े सलाम ने दिलों को कर्बला से जोड़ दिया,
जबकि साहिल नगरामी के नौहे ने ऐसा असर किया कि हर शख़्स अपने-अपने बुज़ुर्गों को याद करने लगा।

इसके बाद तमाम मरहूमीन, ख़ास तौर पर मरहूमीन-ए-नगराम के इसाले-सवाब के लिए फ़ातिहा और सूरह-ए-फ़ातिहा पढ़ी गई। उठे हुए हाथों में सिर्फ़ दुआ नहीं थी, बल्कि एक एहसास था कि जो दुनिया से चले गए, वे हमारी यादों और अमल में आज भी ज़िंदा हैं।

मजलिस का एक बेहद जज़्बाती और यादगार लम्हा तब आया, जब अम्बर फ़ाउंडेशन के चेयरमैन वफ़ा अब्बास को शाल पहनाकर सम्मानित किया गया। उनकी हज़रत अली(अ.स) इंटरनेशनल सेंट्रल यूनिवर्सिटी के लिए की जा रही कोशिशों को इल्म और कौम के भविष्य से जोड़ते हुए सराहा गया। मजलिस में मौजूद लोगों ने उनकी सेहत, कामयाबी और मिशन की तकमील के लिए ख़ास दुआ की। यह मंज़र इस बात की गवाही था कि अज़ादारी और इल्म एक ही रास्ते के दो नाम हैं।

इस मजलिस में अफ़सर नगरामी, नज्जन चचा, मसूद अख़्तर, प्रोफेसर नज़र सिब्तैन, सआदत हुसैन, एडवोकेट रेहान मुस्तफ़ा, ज़हीर हुसैन, मुज्तबा अब्बास, मीसम अब्बास, अली अब्बास, आरिफ़ रिज़वी, सैफ़ रिज़वी के अलावा बड़ी तादाद में अज़ादार और मोमिनीन मौजूद रहे।

अंजुमन-ए-अब्बासिया, नगराम के ज़ेरे-एहतेमाम आयोजित यह सालाना मजलिस इस बात का सबूत बनी कि नगराम आज भी अपनी रूहानी जड़ों से जुड़ा हुआ है जहाँ बुज़ुर्गों की याद सिर्फ़ अल्फ़ाज़ में नहीं, बल्कि मजलिसों, दुआओं और किरदार में ज़िंदा है।

दुआ है कि अल्लाह तआला नगराम के तमाम मरहूमीन की मग़फिरत फ़रमाए, उनकी क़ब्रों को नूर से भर दे और हमें इमाम हुसैन(अ.स) के रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

 हुसैनियत ज़िंदा रहे
अज़ा ज़िंदा रहे
और बुज़ुर्गों की याद हमेशा ज़िंदा रहे

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