रिपोर्ट : हसनैन मुस्तफा
नगराम टाइम्स
लखनऊ/नगराम। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे नगराम का नाम कभी सिर्फ एक कस्बे के तौर पर नहीं, बल्कि नफ़ासत, ज़ायके, तहज़ीब और खेती की विरासत के तौर पर लिया जाता था।यह वही नगराम है, जहां का पान नवाबों की महफिलों से लेकर आम आदमी की दिनचर्या तक में शामिल रहा। यह सिर्फ एक माउथ फ्रेशनर नहीं था, बल्कि एक मिज़ाज, एक रिवायत, और एक रोज़गार भी था।
कभी नगराम की राहों से गुजरते हुए सड़क किनारे दूर-दूर तक दिखने वाले पान के भीटे, कुंदरू, परवल और दूसरी सब्ज़ियों की हरियाली इस इलाके की पहचान हुआ करती थी। यहां का पान सिर्फ लखनऊ या उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं था, बल्कि देश के कई हिस्सों और विदेशों तक अपनी अलग पहचान रखता था। मगर आज यही नगराम, यही पान, और यही किसान सरकारी अनदेखी की मार झेलते हुए खामोशी से टूट रहे हैं।

पान सिर्फ स्वाद नहीं, परंपरा और सेहत से भी जुड़ा रहा है
भारत में पान का इतिहास सदियों पुराना है। आयुर्वेदिक और शोध आधारित साहित्य में पान के पत्ते (Betel Leaf / Piper betle) को पारंपरिक रूप से माउथ फ्रेशनर, पाचन में सहायक, रोगाणुरोधी (antimicrobial), एंटीऑक्सीडेंट और कुछ हद तक सूजन-रोधी गुणों वाला माना गया है। कई वैज्ञानिक अध्ययनों में पान के पत्ते में ऐसे तत्व बताए गए हैं जो मुख स्वच्छता, सांस की दुर्गंध कम करने, और कुछ पारंपरिक औषधीय उपयोगों में सहायक माने जाते हैं। हालांकि यह भी जरूरी है कि पान के पत्ते और तंबाकू/गुटखा मिश्रित पान को एक जैसा न समझा जाए, क्योंकि नुकसान अक्सर मिलावटी/नशीले मिश्रणों से जुड़ता है, पत्ते से नहीं।
यानी, जिस चीज़ को आज बाज़ार में हल्के में देखा जा रहा है, वह दरअसल भारत की कृषि, संस्कृति और आयुर्वेदिक विरासत का हिस्सा रही है।
लाखों की लागत, लेकिन सरकारी सहारा शून्य
नगराम और उसके आसपास के पान किसानों का दर्द बेहद गहरा है। किसानों का कहना है कि पान की खेती कोई साधारण खेती नहीं, बल्कि यह बेहद नाज़ुक, मेहनत-तलब और जोखिम भरा काम है।इसमें भीटा तैयार करने, बांस-बल्ली, छाया व्यवस्था, पानी, देखभाल, मजदूरी और लगातार निगरानी पर भारी खर्च आता है।
एक छोटी सी लापरवाही, मौसम की मार, नमी का असंतुलन या गर्मी/बरसात की मार पूरी फसल को तबाह कर सकती है।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी संवेदनशील और लागत वाली खेती होने के बावजूद पान किसानों को न पर्याप्त सरकारी अनुदान मिलता है, न बीमा, न आपदा राहत, न कोई ठोस सुरक्षा कवच।
किसानों का कहना है कि अगर कोई युवा किसान पान की खेती करना भी चाहे, तो उसके सामने सबसे बड़ी समस्या भूमि और पूंजी की होती है।बहुत से किसान अपनी जमीन न होने के कारण किराये पर खेत लेकर यह खेती करने को मजबूर हैं।ऐसे में यह खेती अब रोज़गार कम, जोखिम ज्यादा बनती जा रही है।
“अगर सरकार साथ दे दे, तो पैदावार दोगुनी हो सकती है”
नगराम के पान किसानों का साफ कहना है कि अगर सरकार वाकई सबका साथ, सबका विकास के नारे को जमीन पर उतारना चाहती है, तो पान किसानों को भी उसी गंभीरता से देखना होगा, जिस तरह दूसरी फसलों को देखा जाता है।*
किसानों का कहना है :
“हम लोग लाखों रुपये लगाकर पान उगाते हैं, लेकिन न कोई अनुदान, न बीमा, न आपदा में राहत। अगर सरकार थोड़ी मदद कर दे, तकनीकी मार्गदर्शन दे दे, और कुछ योजनाओं में पान को शामिल कर दे, तो हमारी पैदावार और आमदनी दोनों दोगुनी हो सकती हैं।”
यह मांग कोई अनुचित मांग नहीं है।क्योंकि उत्तर प्रदेश में पान की खेती कोई मामूली परंपरा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के पेट, पहचान और पुश्तैनी हुनर से जुड़ी हुई है।
जब दूसरी फसलों को राहत मिलती है, तो पान किसान क्यों उपेक्षित?
किसानों का दर्द यह भी है कि जब गेहूं, धान, गन्ना या दूसरी फसलों को आगजनी, बाढ़, बारिश, ओलावृष्टि या अन्य आपदाओं में सरकारी राहत और मुआवजा मिलता है, तो पान की खेती करने वालों को क्यों भुला दिया जाता है?
क्या पान किसान अन्नदाता नहीं?
क्या उनकी मेहनत कम है?क्या उनकी फसल कम संवेदनशील है?
या सिर्फ इसलिए कि यह फसल “सिस्टम” की प्राथमिकता में नहीं है?
यही वह सवाल है जो अब नगराम की गलियों, खेतों और पान के भीटों से उठकर सरकार और कृषि विभाग के दरवाजे तक पहुंचना चाहिए।
चौरसिया बिरादरी की पुश्तैनी पहचान पर संकट
नगराम में पान की खेती सिर्फ आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि चौरसिया बिरादरी की पुश्तैनी पहचान रही है।यह वह बिरादरी है जिसने पीढ़ियों तक अपने पसीने, हुनर और सब्र से पान की खेती को जिंदा रखा।मगर अब हालात ऐसे हो गए हैं कि इस बिरादरी के बहुत से लोग मजबूरी में दूसरे कामों की तरफ रुख कर चुके हैं।
जब एक बिरादरी अपनी पुश्तैनी पहचान छोड़ने पर मजबूर हो जाए, तो यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं होता। यह सांस्कृतिक और सामाजिक नुकसान भी होता है।
आज चौरसिया समाज के सामने सवाल सिर्फ रोज़गार का नहीं, बल्कि विरासत बचाने का है।
बार-बार गुहार, फिर भी कोई सुनवाई नहीं
स्थानीय किसानों और समाज के लोगों का आरोप है कि चौरसिया समाज के बेचालाल चौरसिया समेत कई लोगों ने इस मुद्दे को कई बार उच्च अधिकारियों तक लिखित रूप में पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन अब तक किसी अधिकारी ने गंभीर संज्ञान नहीं लिया।
यही उदासीनता किसानों की सबसे बड़ी पीड़ा है।क्योंकि किसान सिर्फ पैसों की मांग नहीं कर रहे, वे इंसाफ, मान्यता और संरक्षण की मांग कर रहे हैं।
नगराम का पान सिर्फ खेती नहीं, ‘हेरिटेज क्रॉप’ की तरह बचाया जाना चाहिए
सरकार यदि चाहे तो नगराम के पान को सिर्फ एक स्थानीय खेती नहीं, बल्कि “हेरिटेज एग्री-प्रोडक्ट” के रूप में विकसित कर सकती है।
इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं :-
पान किसानों की प्रमुख मांगेंपान की खेती को विशेष फसल का दर्जा मिले।
पान किसानों को सरकारी अनुदान दिया जाए।
पान की खेती को फसल बीमा योजना से जोड़ा जाए।
बारिश, आंधी, आगजनी, गर्मी व आपदा में मुआवजा मिले।
नगराम के पान के लिए ब्रांडिंग और मार्केटिंग सहायता दी जाए।
पान किसानों के लिए तकनीकी प्रशिक्षण और कृषि विशेषज्ञों की नियमित विज़िट हो।
छोटे किसानों को पट्टे/किराये की भूमि पर भी योजनाओं का लाभ मिले
पान, कुंदरू, परवल जैसी पारंपरिक फसलों के लिए क्लस्टर योजना बनाई जाए।
सरकार से नाराज़गी नहीं, उम्मीद है
यह खबर सरकार के खिलाफ गुस्से की नहीं, बल्कि जमीन की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने की कोशिश है।
योगी सरकार अगर वाकई गांव, किसान और पारंपरिक खेती की बात करती है, तो नगराम के पान किसानों की तरफ एक बार दिल से देखना होगा।
क्योंकि विकास सिर्फ एक्सप्रेसवे, कॉरिडोर और बड़ी परियोजनाओं से नहीं होता। विकास तब पूरा होता है, जब नगराम के भीटे भी मुस्कुराएं,जब चौरसिया बिरादरी को लगे कि उनकी मेहनत बेकार नहीं गई,और जब पान की हर पत्ती में फिर से उम्मीद की हरियाली लौट आए।
अगर नगराम का पान खत्म हो गया,तो सिर्फ एक खेती नहीं मरेगी एक तहज़ीब, एक ज़ायका, एक इतिहास और एक बिरादरी की पहचान भी कमज़ोर पड़ जाएगी।
अब देखना यह है किकृषि विभाग और सरकार इस खामोश पुकार को सुनते हैं…या फिर नगराम का पान यूं ही तन्हा सूखता रहेगा।

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